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Tuesday, 21 November 2017
12:15 बजे डॉ एच एस रावत फ्री कुंडली बताएंगे। आप मैसेज बॉक्स में अपनी डिट...
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ধন প্রাপ্তি
এই সময়কালে আপনার মধ্যে একটি অসাধারণ সৃজনশীলতা ও মেধাশক্তির প্রবণতা লক্ষ্য করা যাবে। আপনি খুব রোমান্টিক বোধ করবেন এবং আপনার কাজকে একটি শিল্প হিসেবে গ্রহণ করবেন ও নতুন ধারণার সৃষ্টি হবে। পরিচিতিদের সঙ্গে যোগাযোগের আরো সুযোগ আসতে পারে এবং এটা যোগাযোগ বৃদ্ধির দারুণ সম্ভাব্য বিষয়। সাহসী পদক্ষেপ এবং সাধিত প্রতিভা আপনার জন্য টাকা ও আধ্যাত্মিকতা সম পরিমাণে বয়ে আনবে। পারিবারিক জীবনে সামঞ্জস্যপূর্ণ পরিবেশ নিশ্চিত করে থাকবে। সামান্য শারীরিক সমস্যা থাকতে পারে। আপনার ভাগ্যে বাড়ী নির্মাণ অথবা গাড়ী ক্রয়ের সম্ভাবনা আছে। আপনার জন্য এটি একটি পুরষ্কারস্বরূপ সময়।
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Friday, 17 November 2017
মালব্য যোগ
मालव्य योग
मालव्य योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी कुंडली में बनने वाले बहुत शुभ योगों में से एक माना जाता है तथा यह योग पंचमहापुरुष योग में से एक है। पंच महापुरुष योग में आने वाले शेष चार योग हंस योग, रूचक योग, भद्र योग एवम शश योग हैं। वैदिक ज्योतिष में मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार शुक्र यदि किसी कुंडली में लग्न से अथवा चन्द्रमा से केन्द्र के घरों में स्थित हों अर्थात शुक्र यदि किसी कुंडली में लग्न अथवा चन्द्रमा से 1, 4, 7 अथवा 10वें घर में वृष, तुला अथवा मीन राशि में स्थित हों तो ऐसी कुंडली में मालव्य योग बनता है जिसका शुभ प्रभाव जातक को साहस, पराक्रम, शारीरिक बल, तर्क करने की क्षमता तथा समयानुसार उचित निर्णय लेने की क्षमता प्रदान कर सकता है। माल्वय योग के शुभ प्रबाव में आने वाले जातक सुंदर तथा आकर्षक होते हैं तथा इनमें दूसरे लोगों को विशेषतया विपरीत लिंग के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रबल क्षमता होती है जिसके चलते ऐसे पुरुष जातक स्त्रियों को तथा स्त्री जातक पुरुषों को बहुत पसंद आते हैं। माल्वय योग के विशेष प्रभाव में आने वाले कुछ जातक अपनी सुंदरता तथा कलात्मकता के चलते सिनेमा जगत, माडलिंग आदि क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त करते हैं। माल्वय योग के प्रबल तथा विशेष प्रभाव में आने वालीं स्त्रियां बहुत सुंदर तथा आकर्षक होतीं हैं तथा ये किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में जीत कर राष्ट्रीय अथवा अंतर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकतीं हैं।
मालव्य योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी कुंडली में बनने वाले बहुत शुभ योगों में से एक माना जाता है तथा यह योग पंचमहापुरुष योग में से एक है। पंच महापुरुष योग में आने वाले शेष चार योग हंस योग, रूचक योग, भद्र योग एवम शश योग हैं। वैदिक ज्योतिष में मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार शुक्र यदि किसी कुंडली में लग्न से अथवा चन्द्रमा से केन्द्र के घरों में स्थित हों अर्थात शुक्र यदि किसी कुंडली में लग्न अथवा चन्द्रमा से 1, 4, 7 अथवा 10वें घर में वृष, तुला अथवा मीन राशि में स्थित हों तो ऐसी कुंडली में मालव्य योग बनता है जिसका शुभ प्रभाव जातक को साहस, पराक्रम, शारीरिक बल, तर्क करने की क्षमता तथा समयानुसार उचित निर्णय लेने की क्षमता प्रदान कर सकता है। माल्वय योग के शुभ प्रबाव में आने वाले जातक सुंदर तथा आकर्षक होते हैं तथा इनमें दूसरे लोगों को विशेषतया विपरीत लिंग के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रबल क्षमता होती है जिसके चलते ऐसे पुरुष जातक स्त्रियों को तथा स्त्री जातक पुरुषों को बहुत पसंद आते हैं। माल्वय योग के विशेष प्रभाव में आने वाले कुछ जातक अपनी सुंदरता तथा कलात्मकता के चलते सिनेमा जगत, माडलिंग आदि क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त करते हैं। माल्वय योग के प्रबल तथा विशेष प्रभाव में आने वालीं स्त्रियां बहुत सुंदर तथा आकर्षक होतीं हैं तथा ये किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में जीत कर राष्ट्रीय अथवा अंतर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकतीं हैं।
मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा
मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा का यदि ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लगभग हर 12वीं कुंडली में मालव्य योग का निर्माण होता है। कुंडली में 12 घर तथा 12 राशियां होती हैं तथा इनमें से किसी भी एक घर में शुक्र के स्थित होने की संभावना 12 में से 1 रहेगी तथा इसी प्रकार 12 राशियों में से भी किसी एक राशि में शुक्र के स्थित होने की संभावना 12 में से एक ही रहेगी। इस प्रकार 12 राशियों तथा बारह घरों के संयोग से किसी कुंडली में शुक्र के किसी एक विशेष राशि में ही किसी एक विशेष घर में स्थित होने का संयोग 144 में से एक कुंडलियों में बनता है जैसे कि लगभग प्रत्येक 144वीं कुंडली में शुक्र पहले घर में मीन राशि में स्थित होते हैं। मालव्य योग के निर्माण पर ध्यान दें तो यह देख सकते हैं कि कुंडली के पहले घर में शुक्र तीन राशियों वृष, तुला तथा मीन में स्थित होने पर मालव्य योग बनाते हैं। इसी प्रकार शुक्र के किसी कुंडली के चौथे, सातवें अथवा दसवें घर में भी मालव्य योग का निर्माण करने की संभावना 144 में से 3 ही रहेगी तथा इन सभी संभावनाओं का योग 12 आता है जो कुल संभावनाओं अर्थात 144 का 12वां भाग है जिसका अर्थ यह हुआ कि मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार लगभग हर 12वीं कुंडली में इस योग का निर्माण होता है।
मालव्य योग वैदिक ज्योतिष में वर्णित
मालव्य योग वैदिक ज्योतिष में वर्णित एक अति शुभ तथा दुर्लभ योग है तथा इसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले शुभ फल प्रत्येक 12वें व्यक्ति में देखने को नहीं मिलते जिसके कारण यह कहा जा सकता है कि केवल शुक्र की कुंडली के किसी घर तथा किसी राशि विशेष के आधार पर ही इस योग के निर्माण का निर्णय नहीं किया जा सकता तथा किसी कुंडली में मालव्य योग के निर्माण के कुछ अन्य नियम भी होने चाहिएं। किसी भी अन्य शुभ योग के निर्माण के भांति ही मालव्य योग के निर्माण के लिए भी यह अति आवश्यक है कि कुंडली में शुक्र शुभ हों क्योंकि कुंडली में शुक्र के अशुभ होने से शुक्र के उपर बताए गए विशेष घरों तथा राशियों में स्थित होने पर भी मालव्य योग नहीं बनेगा अपितु इस स्थिति में शुक्र कुंडली में किसी गंभीर दोष का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में अशुभ शुक्र यदि वृष, तुला अथवा मीन राशि में कुंडली के पहले घर में स्थित हो तो ऐसी कुंडली में माल्वय योग नहीं बनेगा अपितु इस कुंडली में अशुभ शुक्र दोष बना सकता है जिसके कारण जातक के चरित्र, व्यक्तित्व तथा व्यवसाय आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है जिसके चलते इस दोष के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भौतिक सुखों की चरम लालसा रखने वाले होते हैं तथा अपनी इन लालसाओं की पूर्ति के लिए ऐसे जातक किसी अवैध अथवा अनैतिक कार्य में सलंग्न हो सकते हैं जिसके कारण इन्हें समय समय पर मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है तथा समाज में अपयश भी मिल सकता है। इसी प्रकार कुंडली के उपर बताए गए अन्य घरों में स्थित अशुभ शुक्र भी मालव्य योग न बना कर कोई दोष बना सकता है जो अपनी स्थिति और बल के अनुसार जातक को अशुभ फल दे सकता है। इसलिए किसी कुंडली में मालव्य योग बनाने के लिए शुक्र का उस कुंडली में शुभ होना अति आवश्यक है।
कुंडली में शुक्र के शुभ होने के पश्चात
कुंडली में शुक्र के शुभ होने के पश्चात यह भी देखना चाहिए कि कुंडली में शुक्र को कौन से शुभ अथवा अशुभ ग्रह प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि किसी कुंडली में शुभ शुक्र पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव शुक्र द्वारा बनाए जाने वाले मालव्य योग के शुभ फलों को कम कर सकता है तथा किसी कुंडली में शुभ शुक्र पर दो या दो से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रबल प्रभाव कुंडली में बनने वाले मालव्य योग को प्रभावहीन भी बना सकता है। इसके विपरीत किसी कुंडली में शुभ शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली में बनने वाले मालव्य योग के शुभ फलों को और भी बढ़ा सकता है जिससे जातक को प्राप्त होने वाले शुभ फलों में बहुत वृद्धि हो जाएगी। इसके अतिरिक्त कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ अशुभ योगों अथवा दोषों का भी भली भांति अध्ययन करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बनने वाले पित्र दोष, मांगलिक दोष तथा काल सर्प दोष जैसे दोष माल्वय योग के प्रभाव को कम कर सकते हैं जबकि कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ योग इस योग के प्रभाव को और अधिक बढ़ा सकते हैं। इसलिए किसी कुंडली में माल्वय योग के निर्माण तथा इसके शुभ फलों का निर्णय करने से पहले इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी नियमों का उचित रूप से अध्ययन कर लेना चाहिए। कुंडली के पहले घर में बनने वाला माल्वय योग जातक को सौंदर्य, व्यवसायिक सफलता तथा प्रसिद्धि जैसे शुभ फल प्रदान कर सकता है। कुंडली के चौथे घर में बनने वाला माल्वय योग जातक को संपत्ति, ऐश्वर्य, वैवाहिक सुख, वाहन, विलासपूर्ण घर तथा विदेशों में भ्रमण करने जैसे शुभ फल प्रदान कर सकता है। सातवें घर का माल्वय योग जातक को एक सुंदर तथा निष्ठावान पत्नि अथवा पति प्रदान कर सकता है तथा ऐसे जातक व्यवसाय के माध्यम, सिनेमा जगत, फैशन जगत अथवा सौंदर्य प्रतियोगिताओं के माध्यम से राष्ट्रीय अथवा अंतर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकते हैं। दसवें घर का माल्वय योग जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में बहुत अच्छे परिणाम दे सकता है तथा इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक व्यापार, सिनेमा, होटल व्यवसाय, एयरलांइस सेवा आदि जैसे व्यवसायों के माध्यम से बहुत धन तथा ख्याति अर्जित कर सकते हैं।
मालव्य योग-एक विश्लेषण
ज्योतिष के प्रसिद्घ ग्रंथ फलदीपिका के योगाध्याय में निम्न श्लोक में पंच महापुरूष योगों का वर्णन किया गया है:-
रूचकभद्रकहंसक मालवा:
सशशका इति पंच च कीर्तिता:।
स्वभवनोच्चागतेषु चतुष्टये
क्षितिसुतादिषु तान् क्रमशौ वदेत।
अर्थात् पंच महापुरूष योग रूचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश हैं जो क्रमश: मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि के जन्मपत्रिका में, केन्द्र में स्वराशि अथवा उच्चा राशि में स्थित होने पर बनते हैं। प्रस्तुत लेख में हम मालव्य योग का विस्तृत विवेचन करेंगे। मंत्रेश्वर जी के अनुसार-
रूचकभद्रकहंसक मालवा:
सशशका इति पंच च कीर्तिता:।
स्वभवनोच्चागतेषु चतुष्टये
क्षितिसुतादिषु तान् क्रमशौ वदेत।
अर्थात् पंच महापुरूष योग रूचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश हैं जो क्रमश: मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि के जन्मपत्रिका में, केन्द्र में स्वराशि अथवा उच्चा राशि में स्थित होने पर बनते हैं। प्रस्तुत लेख में हम मालव्य योग का विस्तृत विवेचन करेंगे। मंत्रेश्वर जी के अनुसार-
पुष्टाङगे धृतिमान्धनी सुतवधू भाग्यान्वितो वर्धनो
मालव्ये सुखभुवसुवाहनयशा विद्वान्प्रसन्नेद्रिय:।
अर्थात् मालव्य योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति आकर्षक, कांतिमान, पुष्ट शरीर वाला, धैर्यवान, विद्वान, प्रसन्नचित्त रहने वाला, सदैव वृद्धि को प्राप्त करने वाला, विवेकशील बुद्धि का धनी होता है। उसको समस्त ऎश्वर्य, धन-संपत्ति, संतान सुख आदि सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। वह सौभाग्यशाली होता है, उसे भौतिक सुख आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। वाहनों का पर्याप्त सुख तथा उसकी कीर्ति और प्रसिद्धि सर्वत्र फैलती है। वह जन्मजात विद्वान होता है, सुबोध मति वाला और सुखों को आजीवन भोगने वाला होता है।
मालव्ये सुखभुवसुवाहनयशा विद्वान्प्रसन्नेद्रिय:।
अर्थात् मालव्य योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति आकर्षक, कांतिमान, पुष्ट शरीर वाला, धैर्यवान, विद्वान, प्रसन्नचित्त रहने वाला, सदैव वृद्धि को प्राप्त करने वाला, विवेकशील बुद्धि का धनी होता है। उसको समस्त ऎश्वर्य, धन-संपत्ति, संतान सुख आदि सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। वह सौभाग्यशाली होता है, उसे भौतिक सुख आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। वाहनों का पर्याप्त सुख तथा उसकी कीर्ति और प्रसिद्धि सर्वत्र फैलती है। वह जन्मजात विद्वान होता है, सुबोध मति वाला और सुखों को आजीवन भोगने वाला होता है।
ज्योतिष ग्रंथ बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार पंच महापुरूष योगाध्याय के अन्तर्गत निम्न तीन श्लोक जन्मपत्रिका में स्थित मालव्य महापुरूष योग के गुणावगुणों की व्याख्या देते हैं:-
समौष्ठ: कृशमध्यश्च चन्द्रकान्तिरूचि: पुमान्।
सुगन्धौ नातिरक्ताङ्गो न ह्वस्वो नातिदीर्घक।
समस्वच्छरदो हस्तिनाद आजानुबाहुधृक्।
मुखंविश्वाङग्लु दैर्ये विस्तारे दशाङग्लुम्।
मालवो मालवाख्यं च देशं पाति ससिन्धुकम्।
सुखं सप्तति वर्षान्तं भुक्त्वा याति सुरालयम्।
अर्थात् मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति आकर्षक होंठ वाला, चन्द्र के समान कांति वाला, गौरवर्ण, मध्यम कद, धवल एवं स्वच्छ दंतावलियुक्त, हस्तिगर्जनायुक्त, लंबी भुजाएँ, दीर्घायु एवं भौतिक-सांसारिक सुखों को भोगते हुए जीवन व्यतीत करता है।
शुक्रदेव के प्रिय विषयों में कवि, काव्य, गान, गीत-संगीत, अभिनय कला, ललित कला, रहस्य, गूढ़, कल्पनाप्रवणता, उच्चा कोटि का दर्शन, लेखन, अध्यापन, सभ्यता और सुसंस्कृति, नम्रता और मृदुभाषिता आदि हैं। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि शुक्रदेव इन समस्त गुणों के महानायक हैं। जब शुक्रदेव किसी व्यक्ति की कुंडली में मालव्य योग का निर्माण करते हैं तो ऎसा व्यक्ति निश्चित रूप से ही इन कलाओं में से किसी कला विशेष का मर्मज्ञ, पंडित, निपुण होकर महान प्रतिष्ठा एवं यश अर्जित कर समाज में अपने लिए एक विशिष्ट स्थान बना लेता है और महापुरूषों की श्रेणी में गिना जाने लगता है।
समौष्ठ: कृशमध्यश्च चन्द्रकान्तिरूचि: पुमान्।
सुगन्धौ नातिरक्ताङ्गो न ह्वस्वो नातिदीर्घक।
समस्वच्छरदो हस्तिनाद आजानुबाहुधृक्।
मुखंविश्वाङग्लु दैर्ये विस्तारे दशाङग्लुम्।
मालवो मालवाख्यं च देशं पाति ससिन्धुकम्।
सुखं सप्तति वर्षान्तं भुक्त्वा याति सुरालयम्।
अर्थात् मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति आकर्षक होंठ वाला, चन्द्र के समान कांति वाला, गौरवर्ण, मध्यम कद, धवल एवं स्वच्छ दंतावलियुक्त, हस्तिगर्जनायुक्त, लंबी भुजाएँ, दीर्घायु एवं भौतिक-सांसारिक सुखों को भोगते हुए जीवन व्यतीत करता है।
शुक्रदेव के प्रिय विषयों में कवि, काव्य, गान, गीत-संगीत, अभिनय कला, ललित कला, रहस्य, गूढ़, कल्पनाप्रवणता, उच्चा कोटि का दर्शन, लेखन, अध्यापन, सभ्यता और सुसंस्कृति, नम्रता और मृदुभाषिता आदि हैं। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि शुक्रदेव इन समस्त गुणों के महानायक हैं। जब शुक्रदेव किसी व्यक्ति की कुंडली में मालव्य योग का निर्माण करते हैं तो ऎसा व्यक्ति निश्चित रूप से ही इन कलाओं में से किसी कला विशेष का मर्मज्ञ, पंडित, निपुण होकर महान प्रतिष्ठा एवं यश अर्जित कर समाज में अपने लिए एक विशिष्ट स्थान बना लेता है और महापुरूषों की श्रेणी में गिना जाने लगता है।
यदि हम मालव्य योग के धारक व्यक्ति की कुंडलियों का विश्लेषण करें तो स्वत: अनुमान लगा पायेंगे कि मालव्य योग व्यक्ति को किस सीमा तक ऊँचाई देता है। यद्यपि जन्मपत्रिका में केवल मात्र मालव्य योग ही श्रेष्ठता नहीं देता अपितु अन्य ग्रह स्थिति भी देखी जानी चाहिये परंतु फिर भी इस योग में उत्पन्न व्यक्ति में शुक्र के विषयों के प्रति एक महान आकर्षण रहता है और वह इन्हीं विषयों में से किसी एक में शुक्र का आशीर्वाद पाकर स्थापित हो जाता है। महापुरूष योग व्यक्ति के चरित्र का निर्धारण करते हुए क्षेत्र विशेष में श्रेष्ठतर, पद-प्रतिष्ठा प्राप्त कराता है। मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति अति आधुनिक पद्धतियों का अनुसरण करते हुए संगीत, प्राचीन विद्याएं, प्रेम काव्य, प्रेम गीत, अभिनय आदि के क्षेत्रों में पारंगत होकर प्रसिद्ध हो जाता है। अब कुछ महापुरूषों की कुण्डलियों में इस मालव्य योग के प्रभाव को देखते हैं।
(1)टी.एस.इलियट। इलियट के बारे में यह प्रसिद्घ है कि जो उन्हें समझ गया, वह अंग्रेजी साहित्य को समझ गया। उनकी जन्मपत्रिका में तुला राशि में, लग्न में, स्वगृही शुक्र, बुध से युत होकर मालव्य योग बना रहे हैं। यहाँ "एक और एक ग्यारह" होना भी चरितार्थ हो रहा है। एक ओर जहाँ शुक्र तुला राशि में स्थित होकर महापुरूष योग बना रहे हैं तो दूसरी ओर बुद्घिमान एवं तार्किक बुध का साथ भी मिल जाने से उन्होंने अपनी वाणी को मूर्त रूप में और गहराई से अभिव्यक्त किया। मानवीय भावनाओं को अंतर्मन तक छू लेना ही इलियट की विशेषता रही है। संभवत: यही कारण रहा कि शुक्र की रहस्यमयी एवं भाव प्रवणता का सानिध्य पाकर इलियट द्वारा परम रहस्यवादी साहित्य का सृजन हुआ। उनका काव्य दुर्बोध एवं दुरूह तो है ही पर रहस्यों से भी भरा है।
(2)अंग्रेजी साहित्य में सुंदरता की अभिव्यक्ति का पर्याय माने जाने वाले जॉन कीट्स अंग्रेजी काव्य के नवरसों के सिरमौर कहे जाते हैं। जिन्होंने श्रृंगार रस से ओत-प्रोत महान रचनाओं को जन्म दिया। यह सब मालव्य योग के कारण ही संभव हुआ कि उनके जन्म लग्न में शुक्र, तुला राशि में स्थित होकर नीच के सूर्य से युत हैं। यद्यपि शुक्र नीच राशि स्थित सूर्य से युत हैं परंतु तब भी उनकी कामाग्नि को, मालव्य योग ने महान साहित्य की सर्जना की ओर मो़डकर, श्रृंगार प्रधान साहित्य में परिवर्तित कर दिया और काव्य की अनुपम एवं अद्वितीय रचनाओं को जन्म देने में सफल रहे कीट्स। अल्पायु में ही महान साहित्य का सृजन मालव्य योग ने उच्चा के चंद्र ने अष्टम भाव (शोध सृजन) में स्थित होकर, द्वितीय भाव (वाणी) पर दृष्टि डालकर करवाया है और वे महान पुरूष बन गये।
यदि हम शुक्र के मालव्य योग का विश्लेषण उनकी विनम्रता, सभ्यता, सुसंस्कृति, कमनीय कांति एवं आकर्षक व्यक्तित्व एवं शुक्र की महानता के प्रसंग में करें तो हमारी दृष्टि अनायास ही हमारे देश की एक नेता सोनिया गाँधी की जन्मपत्रिका पर जाती है। उनकी जन्मपत्रिका में तुला राशि में स्थित होकर शुक्र, चतुर्थ भाव अर्थात् जन समर्थन के भाव में देवगुरू बृहस्पति के साथ बैठे हैं और मालव्य योग का सृजन कर रहे हैं।
यदि हम शुक्र के मालव्य योग का विश्लेषण उनकी विनम्रता, सभ्यता, सुसंस्कृति, कमनीय कांति एवं आकर्षक व्यक्तित्व एवं शुक्र की महानता के प्रसंग में करें तो हमारी दृष्टि अनायास ही हमारे देश की एक नेता सोनिया गाँधी की जन्मपत्रिका पर जाती है। उनकी जन्मपत्रिका में तुला राशि में स्थित होकर शुक्र, चतुर्थ भाव अर्थात् जन समर्थन के भाव में देवगुरू बृहस्पति के साथ बैठे हैं और मालव्य योग का सृजन कर रहे हैं।
(3)हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी सोनिया गाँधी जी के व्यक्तित्व में कमनीयता,नम्रता, शालीनता, सहजता, लोकप्रियता एवं शुक्र जैसी महानता के गुणों की झलक उनके दैनंदिन व्यवहार में मिलती रहती है। शुक्र एवं बृहस्पति दोनों गुरूओं के चतुर्थ भाव में स्थित होने से, उनमें शुक्र जैसी सीखने की क्षमता देखने को मिलती है। हिन्दी भाषा से पूर्णतया अनभिज्ञ होने पर भी उन्होंने उसे सीखकर भारतीय जनमानस में अपनी एक जगह बनाई। यद्यपि देश की जनता का पूर्ण समर्थन भी उन्हें प्राप्त था कि वे प्रधानमंत्री बनें परन्तु उन्हौंने प्रधानमंत्री जैसा पद भी अस्वीकार कर दिया किंतु इस योग के प्रभाव में पद नहीं होते हुए भी नियंत्रक की भूमिका निभा रही हैं।
(4)शुक्र की कलात्मकता के लिए हमें संसार के महान चित्रकार लियो नार्दो दा विन्सी के जन्म चक्र को पढ़ना होगा। उनकी कुंडली में शुक्र देव सप्तम भाव में वृष राशि में स्थित होकर मालव्य योग की रचना कर रहे हैं। सप्तम भाव कलत्र या काम का भी भाव है परंतु दशम से दशम अर्थात् सप्तम भाव भी आजीविका का है। यहाँ स्थित शुक्र ने विंसी की काम भावना को कला में परिणत कर दिया और कला को पराकाष्ठा पर पहुँचाया, जिससे इस महान चित्रकार द्वारा चित्रकला के अनुपम, अद्वितीय और शाश्वत चित्रों की रचना की गई। उनकी मोनालिसा और दी लास्ट सपर जैसी महान चित्रकृतियाँ आज भी विश्व में प्रसिद्ध हैं।
मालव्य योग का एक और रूप देखें जो शुक्र के अभिनय, नृत्य, गान, निर्देशन जैसे गुणों का प्रकटीकरण करता है। यह कुंडली अभिनेता राजकपूर की है, जो भारतीय सिने जगत के एक महान कलाकार थे... मालव्य योग न केवल कला एवं सौंदर्य के महान पारखी अपितु शुक्र की भाव प्रवणता एवं संवेदनशीलता इस कलाकार में कूट-कूटकर भरी हुई थी। जिन्होंने अभिनय को नई और शाश्वत ऊँचाईयाँ दी। एक और उन्होंने विषय प्रधान फिल्मों का निर्माण किया तो दूसरी ओर उनके अभिनय में व्यक्ति के दिल को छू जाने वाली भावनाएं भी थीं। वे कला प्रवीण तो थे ही, साथ ही उसी कला के पारखी बनकर उन्होंने उत्तम निर्देशन की मिसाल भी कायम की जो आज भी फिल्म उद्योग में जानी जाती है। वे सिने जगत में लंबे समय तक छाए रहे। उनकी कुंडली में तुला राशि में, चतुर्थ भाव में स्थित होकर मालव्य योग की रचना कर रहे हैं साथ ही शनि से युत भी हैं जो मालव्य योग की महानता के कारण कला के साथ न्याय करने में भी पूर्णतया सफल रहे। शुक्रदेव के मालव्य योग की प्रशंसा और गुणानुवाद जितने किए जाएं कम होगें यदि मैं यूं कहूँ कि बाढ़हिं कथा, पार नहीं पावहिं, तो उचित ही होगा।मालव्य योग
मालव्य योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी कुंडली में बनने वाले बहुत शुभ योगों में से एक माना जाता है तथा यह योग पंचमहापुरुष योग में से एक है। पंच महापुरुष योग में आने वाले शेष चार योग हंस योग, रूचक योग, भद्र योग एवम शश योग हैं। वैदिक ज्योतिष में मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार शुक्र यदि किसी कुंडली में लग्न से अथवा चन्द्रमा से केन्द्र के घरों में स्थित हों अर्थात शुक्र यदि किसी कुंडली में लग्न अथवा चन्द्रमा से 1, 4, 7 अथवा 10वें घर में वृष, तुला अथवा मीन राशि में स्थित हों तो ऐसी कुंडली में मालव्य योग बनता है जिसका शुभ प्रभाव जातक को साहस, पराक्रम, शारीरिक बल, तर्क करने की क्षमता तथा समयानुसार उचित निर्णय लेने की क्षमता प्रदान कर सकता है। माल्वय योग के शुभ प्रबाव में आने वाले जातक सुंदर तथा आकर्षक होते हैं तथा इनमें दूसरे लोगों को विशेषतया विपरीत लिंग के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रबल क्षमता होती है जिसके चलते ऐसे पुरुष जातक स्त्रियों को तथा स्त्री जातक पुरुषों को बहुत पसंद आते हैं। माल्वय योग के विशेष प्रभाव में आने वाले कुछ जातक अपनी सुंदरता तथा कलात्मकता के चलते सिनेमा जगत, माडलिंग आदि क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त करते हैं। माल्वय योग के प्रबल तथा विशेष प्रभाव में आने वालीं स्त्रियां बहुत सुंदर तथा आकर्षक होतीं हैं तथा ये किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में जीत कर राष्ट्रीय अथवा अंतर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकतीं हैं।
मालव्य योग का एक और रूप देखें जो शुक्र के अभिनय, नृत्य, गान, निर्देशन जैसे गुणों का प्रकटीकरण करता है। यह कुंडली अभिनेता राजकपूर की है, जो भारतीय सिने जगत के एक महान कलाकार थे... मालव्य योग न केवल कला एवं सौंदर्य के महान पारखी अपितु शुक्र की भाव प्रवणता एवं संवेदनशीलता इस कलाकार में कूट-कूटकर भरी हुई थी। जिन्होंने अभिनय को नई और शाश्वत ऊँचाईयाँ दी। एक और उन्होंने विषय प्रधान फिल्मों का निर्माण किया तो दूसरी ओर उनके अभिनय में व्यक्ति के दिल को छू जाने वाली भावनाएं भी थीं। वे कला प्रवीण तो थे ही, साथ ही उसी कला के पारखी बनकर उन्होंने उत्तम निर्देशन की मिसाल भी कायम की जो आज भी फिल्म उद्योग में जानी जाती है। वे सिने जगत में लंबे समय तक छाए रहे। उनकी कुंडली में तुला राशि में, चतुर्थ भाव में स्थित होकर मालव्य योग की रचना कर रहे हैं साथ ही शनि से युत भी हैं जो मालव्य योग की महानता के कारण कला के साथ न्याय करने में भी पूर्णतया सफल रहे। शुक्रदेव के मालव्य योग की प्रशंसा और गुणानुवाद जितने किए जाएं कम होगें यदि मैं यूं कहूँ कि बाढ़हिं कथा, पार नहीं पावहिं, तो उचित ही होगा।मालव्य योग
मालव्य योग को वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी कुंडली में बनने वाले बहुत शुभ योगों में से एक माना जाता है तथा यह योग पंचमहापुरुष योग में से एक है। पंच महापुरुष योग में आने वाले शेष चार योग हंस योग, रूचक योग, भद्र योग एवम शश योग हैं। वैदिक ज्योतिष में मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार शुक्र यदि किसी कुंडली में लग्न से अथवा चन्द्रमा से केन्द्र के घरों में स्थित हों अर्थात शुक्र यदि किसी कुंडली में लग्न अथवा चन्द्रमा से 1, 4, 7 अथवा 10वें घर में वृष, तुला अथवा मीन राशि में स्थित हों तो ऐसी कुंडली में मालव्य योग बनता है जिसका शुभ प्रभाव जातक को साहस, पराक्रम, शारीरिक बल, तर्क करने की क्षमता तथा समयानुसार उचित निर्णय लेने की क्षमता प्रदान कर सकता है। माल्वय योग के शुभ प्रबाव में आने वाले जातक सुंदर तथा आकर्षक होते हैं तथा इनमें दूसरे लोगों को विशेषतया विपरीत लिंग के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रबल क्षमता होती है जिसके चलते ऐसे पुरुष जातक स्त्रियों को तथा स्त्री जातक पुरुषों को बहुत पसंद आते हैं। माल्वय योग के विशेष प्रभाव में आने वाले कुछ जातक अपनी सुंदरता तथा कलात्मकता के चलते सिनेमा जगत, माडलिंग आदि क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त करते हैं। माल्वय योग के प्रबल तथा विशेष प्रभाव में आने वालीं स्त्रियां बहुत सुंदर तथा आकर्षक होतीं हैं तथा ये किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में जीत कर राष्ट्रीय अथवा अंतर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकतीं हैं।
मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा
मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा का यदि ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लगभग हर 12वीं कुंडली में मालव्य योग का निर्माण होता है। कुंडली में 12 घर तथा 12 राशियां होती हैं तथा इनमें से किसी भी एक घर में शुक्र के स्थित होने की संभावना 12 में से 1 रहेगी तथा इसी प्रकार 12 राशियों में से भी किसी एक राशि में शुक्र के स्थित होने की संभावना 12 में से एक ही रहेगी। इस प्रकार 12 राशियों तथा बारह घरों के संयोग से किसी कुंडली में शुक्र के किसी एक विशेष राशि में ही किसी एक विशेष घर में स्थित होने का संयोग 144 में से एक कुंडलियों में बनता है जैसे कि लगभग प्रत्येक 144वीं कुंडली में शुक्र पहले घर में मीन राशि में स्थित होते हैं। मालव्य योग के निर्माण पर ध्यान दें तो यह देख सकते हैं कि कुंडली के पहले घर में शुक्र तीन राशियों वृष, तुला तथा मीन में स्थित होने पर मालव्य योग बनाते हैं। इसी प्रकार शुक्र के किसी कुंडली के चौथे, सातवें अथवा दसवें घर में भी मालव्य योग का निर्माण करने की संभावना 144 में से 3 ही रहेगी तथा इन सभी संभावनाओं का योग 12 आता है जो कुल संभावनाओं अर्थात 144 का 12वां भाग है जिसका अर्थ यह हुआ कि मालव्य योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार लगभग हर 12वीं कुंडली में इस योग का निर्माण होता है।
मालव्य योग वैदिक ज्योतिष में वर्णित
मालव्य योग वैदिक ज्योतिष में वर्णित एक अति शुभ तथा दुर्लभ योग है तथा इसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले शुभ फल प्रत्येक 12वें व्यक्ति में देखने को नहीं मिलते जिसके कारण यह कहा जा सकता है कि केवल शुक्र की कुंडली के किसी घर तथा किसी राशि विशेष के आधार पर ही इस योग के निर्माण का निर्णय नहीं किया जा सकता तथा किसी कुंडली में मालव्य योग के निर्माण के कुछ अन्य नियम भी होने चाहिएं। किसी भी अन्य शुभ योग के निर्माण के भांति ही मालव्य योग के निर्माण के लिए भी यह अति आवश्यक है कि कुंडली में शुक्र शुभ हों क्योंकि कुंडली में शुक्र के अशुभ होने से शुक्र के उपर बताए गए विशेष घरों तथा राशियों में स्थित होने पर भी मालव्य योग नहीं बनेगा अपितु इस स्थिति में शुक्र कुंडली में किसी गंभीर दोष का निर्माण कर सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी कुंडली में अशुभ शुक्र यदि वृष, तुला अथवा मीन राशि में कुंडली के पहले घर में स्थित हो तो ऐसी कुंडली में माल्वय योग नहीं बनेगा अपितु इस कुंडली में अशुभ शुक्र दोष बना सकता है जिसके कारण जातक के चरित्र, व्यक्तित्व तथा व्यवसाय आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है जिसके चलते इस दोष के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भौतिक सुखों की चरम लालसा रखने वाले होते हैं तथा अपनी इन लालसाओं की पूर्ति के लिए ऐसे जातक किसी अवैध अथवा अनैतिक कार्य में सलंग्न हो सकते हैं जिसके कारण इन्हें समय समय पर मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है तथा समाज में अपयश भी मिल सकता है। इसी प्रकार कुंडली के उपर बताए गए अन्य घरों में स्थित अशुभ शुक्र भी मालव्य योग न बना कर कोई दोष बना सकता है जो अपनी स्थिति और बल के अनुसार जातक को अशुभ फल दे सकता है। इसलिए किसी कुंडली में मालव्य योग बनाने के लिए शुक्र का उस कुंडली में शुभ होना अति आवश्यक है।
कुंडली में शुक्र के शुभ होने के पश्चात
कुंडली में शुक्र के शुभ होने के पश्चात यह भी देखना चाहिए कि कुंडली में शुक्र को कौन से शुभ अथवा अशुभ ग्रह प्रभावित कर रहे हैं क्योंकि किसी कुंडली में शुभ शुक्र पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव शुक्र द्वारा बनाए जाने वाले मालव्य योग के शुभ फलों को कम कर सकता है तथा किसी कुंडली में शुभ शुक्र पर दो या दो से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रबल प्रभाव कुंडली में बनने वाले मालव्य योग को प्रभावहीन भी बना सकता है। इसके विपरीत किसी कुंडली में शुभ शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली में बनने वाले मालव्य योग के शुभ फलों को और भी बढ़ा सकता है जिससे जातक को प्राप्त होने वाले शुभ फलों में बहुत वृद्धि हो जाएगी। इसके अतिरिक्त कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ अशुभ योगों अथवा दोषों का भी भली भांति अध्ययन करना चाहिए क्योंकि कुंडली में बनने वाले पित्र दोष, मांगलिक दोष तथा काल सर्प दोष जैसे दोष माल्वय योग के प्रभाव को कम कर सकते हैं जबकि कुंडली में बनने वाले अन्य शुभ योग इस योग के प्रभाव को और अधिक बढ़ा सकते हैं। इसलिए किसी कुंडली में माल्वय योग के निर्माण तथा इसके शुभ फलों का निर्णय करने से पहले इस योग के निर्माण तथा फलादेश से संबंधित सभी नियमों का उचित रूप से अध्ययन कर लेना चाहिए। कुंडली के पहले घर में बनने वाला माल्वय योग जातक को सौंदर्य, व्यवसायिक सफलता तथा प्रसिद्धि जैसे शुभ फल प्रदान कर सकता है। कुंडली के चौथे घर में बनने वाला माल्वय योग जातक को संपत्ति, ऐश्वर्य, वैवाहिक सुख, वाहन, विलासपूर्ण घर तथा विदेशों में भ्रमण करने जैसे शुभ फल प्रदान कर सकता है। सातवें घर का माल्वय योग जातक को एक सुंदर तथा निष्ठावान पत्नि अथवा पति प्रदान कर सकता है तथा ऐसे जातक व्यवसाय के माध्यम, सिनेमा जगत, फैशन जगत अथवा सौंदर्य प्रतियोगिताओं के माध्यम से राष्ट्रीय अथवा अंतर राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकते हैं। दसवें घर का माल्वय योग जातक को उसके व्यवसायिक क्षेत्र में बहुत अच्छे परिणाम दे सकता है तथा इस योग के प्रभाव में आने वाले जातक व्यापार, सिनेमा, होटल व्यवसाय, एयरलांइस सेवा आदि जैसे व्यवसायों के माध्यम से बहुत धन तथा ख्याति अर्जित कर सकते हैं।
मालव्य योग-एक विश्लेषण
ज्योतिष के प्रसिद्घ ग्रंथ फलदीपिका के योगाध्याय में निम्न श्लोक में पंच महापुरूष योगों का वर्णन किया गया है:-
रूचकभद्रकहंसक मालवा:
सशशका इति पंच च कीर्तिता:।
स्वभवनोच्चागतेषु चतुष्टये
क्षितिसुतादिषु तान् क्रमशौ वदेत।
अर्थात् पंच महापुरूष योग रूचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश हैं जो क्रमश: मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि के जन्मपत्रिका में, केन्द्र में स्वराशि अथवा उच्चा राशि में स्थित होने पर बनते हैं। प्रस्तुत लेख में हम मालव्य योग का विस्तृत विवेचन करेंगे। मंत्रेश्वर जी के अनुसार-
रूचकभद्रकहंसक मालवा:
सशशका इति पंच च कीर्तिता:।
स्वभवनोच्चागतेषु चतुष्टये
क्षितिसुतादिषु तान् क्रमशौ वदेत।
अर्थात् पंच महापुरूष योग रूचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश हैं जो क्रमश: मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि के जन्मपत्रिका में, केन्द्र में स्वराशि अथवा उच्चा राशि में स्थित होने पर बनते हैं। प्रस्तुत लेख में हम मालव्य योग का विस्तृत विवेचन करेंगे। मंत्रेश्वर जी के अनुसार-
पुष्टाङगे धृतिमान्धनी सुतवधू भाग्यान्वितो वर्धनो
मालव्ये सुखभुवसुवाहनयशा विद्वान्प्रसन्नेद्रिय:।
अर्थात् मालव्य योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति आकर्षक, कांतिमान, पुष्ट शरीर वाला, धैर्यवान, विद्वान, प्रसन्नचित्त रहने वाला, सदैव वृद्धि को प्राप्त करने वाला, विवेकशील बुद्धि का धनी होता है। उसको समस्त ऎश्वर्य, धन-संपत्ति, संतान सुख आदि सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। वह सौभाग्यशाली होता है, उसे भौतिक सुख आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। वाहनों का पर्याप्त सुख तथा उसकी कीर्ति और प्रसिद्धि सर्वत्र फैलती है। वह जन्मजात विद्वान होता है, सुबोध मति वाला और सुखों को आजीवन भोगने वाला होता है।
मालव्ये सुखभुवसुवाहनयशा विद्वान्प्रसन्नेद्रिय:।
अर्थात् मालव्य योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति आकर्षक, कांतिमान, पुष्ट शरीर वाला, धैर्यवान, विद्वान, प्रसन्नचित्त रहने वाला, सदैव वृद्धि को प्राप्त करने वाला, विवेकशील बुद्धि का धनी होता है। उसको समस्त ऎश्वर्य, धन-संपत्ति, संतान सुख आदि सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। वह सौभाग्यशाली होता है, उसे भौतिक सुख आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। वाहनों का पर्याप्त सुख तथा उसकी कीर्ति और प्रसिद्धि सर्वत्र फैलती है। वह जन्मजात विद्वान होता है, सुबोध मति वाला और सुखों को आजीवन भोगने वाला होता है।
ज्योतिष ग्रंथ बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार पंच महापुरूष योगाध्याय के अन्तर्गत निम्न तीन श्लोक जन्मपत्रिका में स्थित मालव्य महापुरूष योग के गुणावगुणों की व्याख्या देते हैं:-
समौष्ठ: कृशमध्यश्च चन्द्रकान्तिरूचि: पुमान्।
सुगन्धौ नातिरक्ताङ्गो न ह्वस्वो नातिदीर्घक।
समस्वच्छरदो हस्तिनाद आजानुबाहुधृक्।
मुखंविश्वाङग्लु दैर्ये विस्तारे दशाङग्लुम्।
मालवो मालवाख्यं च देशं पाति ससिन्धुकम्।
सुखं सप्तति वर्षान्तं भुक्त्वा याति सुरालयम्।
अर्थात् मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति आकर्षक होंठ वाला, चन्द्र के समान कांति वाला, गौरवर्ण, मध्यम कद, धवल एवं स्वच्छ दंतावलियुक्त, हस्तिगर्जनायुक्त, लंबी भुजाएँ, दीर्घायु एवं भौतिक-सांसारिक सुखों को भोगते हुए जीवन व्यतीत करता है।
शुक्रदेव के प्रिय विषयों में कवि, काव्य, गान, गीत-संगीत, अभिनय कला, ललित कला, रहस्य, गूढ़, कल्पनाप्रवणता, उच्चा कोटि का दर्शन, लेखन, अध्यापन, सभ्यता और सुसंस्कृति, नम्रता और मृदुभाषिता आदि हैं। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि शुक्रदेव इन समस्त गुणों के महानायक हैं। जब शुक्रदेव किसी व्यक्ति की कुंडली में मालव्य योग का निर्माण करते हैं तो ऎसा व्यक्ति निश्चित रूप से ही इन कलाओं में से किसी कला विशेष का मर्मज्ञ, पंडित, निपुण होकर महान प्रतिष्ठा एवं यश अर्जित कर समाज में अपने लिए एक विशिष्ट स्थान बना लेता है और महापुरूषों की श्रेणी में गिना जाने लगता है।
समौष्ठ: कृशमध्यश्च चन्द्रकान्तिरूचि: पुमान्।
सुगन्धौ नातिरक्ताङ्गो न ह्वस्वो नातिदीर्घक।
समस्वच्छरदो हस्तिनाद आजानुबाहुधृक्।
मुखंविश्वाङग्लु दैर्ये विस्तारे दशाङग्लुम्।
मालवो मालवाख्यं च देशं पाति ससिन्धुकम्।
सुखं सप्तति वर्षान्तं भुक्त्वा याति सुरालयम्।
अर्थात् मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति आकर्षक होंठ वाला, चन्द्र के समान कांति वाला, गौरवर्ण, मध्यम कद, धवल एवं स्वच्छ दंतावलियुक्त, हस्तिगर्जनायुक्त, लंबी भुजाएँ, दीर्घायु एवं भौतिक-सांसारिक सुखों को भोगते हुए जीवन व्यतीत करता है।
शुक्रदेव के प्रिय विषयों में कवि, काव्य, गान, गीत-संगीत, अभिनय कला, ललित कला, रहस्य, गूढ़, कल्पनाप्रवणता, उच्चा कोटि का दर्शन, लेखन, अध्यापन, सभ्यता और सुसंस्कृति, नम्रता और मृदुभाषिता आदि हैं। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि शुक्रदेव इन समस्त गुणों के महानायक हैं। जब शुक्रदेव किसी व्यक्ति की कुंडली में मालव्य योग का निर्माण करते हैं तो ऎसा व्यक्ति निश्चित रूप से ही इन कलाओं में से किसी कला विशेष का मर्मज्ञ, पंडित, निपुण होकर महान प्रतिष्ठा एवं यश अर्जित कर समाज में अपने लिए एक विशिष्ट स्थान बना लेता है और महापुरूषों की श्रेणी में गिना जाने लगता है।
यदि हम मालव्य योग के धारक व्यक्ति की कुंडलियों का विश्लेषण करें तो स्वत: अनुमान लगा पायेंगे कि मालव्य योग व्यक्ति को किस सीमा तक ऊँचाई देता है। यद्यपि जन्मपत्रिका में केवल मात्र मालव्य योग ही श्रेष्ठता नहीं देता अपितु अन्य ग्रह स्थिति भी देखी जानी चाहिये परंतु फिर भी इस योग में उत्पन्न व्यक्ति में शुक्र के विषयों के प्रति एक महान आकर्षण रहता है और वह इन्हीं विषयों में से किसी एक में शुक्र का आशीर्वाद पाकर स्थापित हो जाता है। महापुरूष योग व्यक्ति के चरित्र का निर्धारण करते हुए क्षेत्र विशेष में श्रेष्ठतर, पद-प्रतिष्ठा प्राप्त कराता है। मालव्य योग में जन्मा व्यक्ति अति आधुनिक पद्धतियों का अनुसरण करते हुए संगीत, प्राचीन विद्याएं, प्रेम काव्य, प्रेम गीत, अभिनय आदि के क्षेत्रों में पारंगत होकर प्रसिद्ध हो जाता है। अब कुछ महापुरूषों की कुण्डलियों में इस मालव्य योग के प्रभाव को देखते हैं।
(1)टी.एस.इलियट। इलियट के बारे में यह प्रसिद्घ है कि जो उन्हें समझ गया, वह अंग्रेजी साहित्य को समझ गया। उनकी जन्मपत्रिका में तुला राशि में, लग्न में, स्वगृही शुक्र, बुध से युत होकर मालव्य योग बना रहे हैं। यहाँ "एक और एक ग्यारह" होना भी चरितार्थ हो रहा है। एक ओर जहाँ शुक्र तुला राशि में स्थित होकर महापुरूष योग बना रहे हैं तो दूसरी ओर बुद्घिमान एवं तार्किक बुध का साथ भी मिल जाने से उन्होंने अपनी वाणी को मूर्त रूप में और गहराई से अभिव्यक्त किया। मानवीय भावनाओं को अंतर्मन तक छू लेना ही इलियट की विशेषता रही है। संभवत: यही कारण रहा कि शुक्र की रहस्यमयी एवं भाव प्रवणता का सानिध्य पाकर इलियट द्वारा परम रहस्यवादी साहित्य का सृजन हुआ। उनका काव्य दुर्बोध एवं दुरूह तो है ही पर रहस्यों से भी भरा है।
(2)अंग्रेजी साहित्य में सुंदरता की अभिव्यक्ति का पर्याय माने जाने वाले जॉन कीट्स अंग्रेजी काव्य के नवरसों के सिरमौर कहे जाते हैं। जिन्होंने श्रृंगार रस से ओत-प्रोत महान रचनाओं को जन्म दिया। यह सब मालव्य योग के कारण ही संभव हुआ कि उनके जन्म लग्न में शुक्र, तुला राशि में स्थित होकर नीच के सूर्य से युत हैं। यद्यपि शुक्र नीच राशि स्थित सूर्य से युत हैं परंतु तब भी उनकी कामाग्नि को, मालव्य योग ने महान साहित्य की सर्जना की ओर मो़डकर, श्रृंगार प्रधान साहित्य में परिवर्तित कर दिया और काव्य की अनुपम एवं अद्वितीय रचनाओं को जन्म देने में सफल रहे कीट्स। अल्पायु में ही महान साहित्य का सृजन मालव्य योग ने उच्चा के चंद्र ने अष्टम भाव (शोध सृजन) में स्थित होकर, द्वितीय भाव (वाणी) पर दृष्टि डालकर करवाया है और वे महान पुरूष बन गये।
यदि हम शुक्र के मालव्य योग का विश्लेषण उनकी विनम्रता, सभ्यता, सुसंस्कृति, कमनीय कांति एवं आकर्षक व्यक्तित्व एवं शुक्र की महानता के प्रसंग में करें तो हमारी दृष्टि अनायास ही हमारे देश की एक नेता सोनिया गाँधी की जन्मपत्रिका पर जाती है। उनकी जन्मपत्रिका में तुला राशि में स्थित होकर शुक्र, चतुर्थ भाव अर्थात् जन समर्थन के भाव में देवगुरू बृहस्पति के साथ बैठे हैं और मालव्य योग का सृजन कर रहे हैं।
यदि हम शुक्र के मालव्य योग का विश्लेषण उनकी विनम्रता, सभ्यता, सुसंस्कृति, कमनीय कांति एवं आकर्षक व्यक्तित्व एवं शुक्र की महानता के प्रसंग में करें तो हमारी दृष्टि अनायास ही हमारे देश की एक नेता सोनिया गाँधी की जन्मपत्रिका पर जाती है। उनकी जन्मपत्रिका में तुला राशि में स्थित होकर शुक्र, चतुर्थ भाव अर्थात् जन समर्थन के भाव में देवगुरू बृहस्पति के साथ बैठे हैं और मालव्य योग का सृजन कर रहे हैं।
(3)हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी सोनिया गाँधी जी के व्यक्तित्व में कमनीयता,नम्रता, शालीनता, सहजता, लोकप्रियता एवं शुक्र जैसी महानता के गुणों की झलक उनके दैनंदिन व्यवहार में मिलती रहती है। शुक्र एवं बृहस्पति दोनों गुरूओं के चतुर्थ भाव में स्थित होने से, उनमें शुक्र जैसी सीखने की क्षमता देखने को मिलती है। हिन्दी भाषा से पूर्णतया अनभिज्ञ होने पर भी उन्होंने उसे सीखकर भारतीय जनमानस में अपनी एक जगह बनाई। यद्यपि देश की जनता का पूर्ण समर्थन भी उन्हें प्राप्त था कि वे प्रधानमंत्री बनें परन्तु उन्हौंने प्रधानमंत्री जैसा पद भी अस्वीकार कर दिया किंतु इस योग के प्रभाव में पद नहीं होते हुए भी नियंत्रक की भूमिका निभा रही हैं।
(4)शुक्र की कलात्मकता के लिए हमें संसार के महान चित्रकार लियो नार्दो दा विन्सी के जन्म चक्र को पढ़ना होगा। उनकी कुंडली में शुक्र देव सप्तम भाव में वृष राशि में स्थित होकर मालव्य योग की रचना कर रहे हैं। सप्तम भाव कलत्र या काम का भी भाव है परंतु दशम से दशम अर्थात् सप्तम भाव भी आजीविका का है। यहाँ स्थित शुक्र ने विंसी की काम भावना को कला में परिणत कर दिया और कला को पराकाष्ठा पर पहुँचाया, जिससे इस महान चित्रकार द्वारा चित्रकला के अनुपम, अद्वितीय और शाश्वत चित्रों की रचना की गई। उनकी मोनालिसा और दी लास्ट सपर जैसी महान चित्रकृतियाँ आज भी विश्व में प्रसिद्ध हैं।
मालव्य योग का एक और रूप देखें जो शुक्र के अभिनय, नृत्य, गान, निर्देशन जैसे गुणों का प्रकटीकरण करता है। यह कुंडली अभिनेता राजकपूर की है, जो भारतीय सिने जगत के एक महान कलाकार थे... मालव्य योग न केवल कला एवं सौंदर्य के महान पारखी अपितु शुक्र की भाव प्रवणता एवं संवेदनशीलता इस कलाकार में कूट-कूटकर भरी हुई थी। जिन्होंने अभिनय को नई और शाश्वत ऊँचाईयाँ दी। एक और उन्होंने विषय प्रधान फिल्मों का निर्माण किया तो दूसरी ओर उनके अभिनय में व्यक्ति के दिल को छू जाने वाली भावनाएं भी थीं। वे कला प्रवीण तो थे ही, साथ ही उसी कला के पारखी बनकर उन्होंने उत्तम निर्देशन की मिसाल भी कायम की जो आज भी फिल्म उद्योग में जानी जाती है। वे सिने जगत में लंबे समय तक छाए रहे। उनकी कुंडली में तुला राशि में, चतुर्थ भाव में स्थित होकर मालव्य योग की रचना कर रहे हैं साथ ही शनि से युत भी हैं जो मालव्य योग की महानता के कारण कला के साथ न्याय करने में भी पूर्णतया सफल रहे। शुक्रदेव के मालव्य योग की प्रशंसा और गुणानुवाद जितने किए जाएं कम होगें यदि मैं यूं कहूँ कि बाढ़हिं कथा, पार नहीं पावहिं, तो उचित ही होगा।
मालव्य योग का एक और रूप देखें जो शुक्र के अभिनय, नृत्य, गान, निर्देशन जैसे गुणों का प्रकटीकरण करता है। यह कुंडली अभिनेता राजकपूर की है, जो भारतीय सिने जगत के एक महान कलाकार थे... मालव्य योग न केवल कला एवं सौंदर्य के महान पारखी अपितु शुक्र की भाव प्रवणता एवं संवेदनशीलता इस कलाकार में कूट-कूटकर भरी हुई थी। जिन्होंने अभिनय को नई और शाश्वत ऊँचाईयाँ दी। एक और उन्होंने विषय प्रधान फिल्मों का निर्माण किया तो दूसरी ओर उनके अभिनय में व्यक्ति के दिल को छू जाने वाली भावनाएं भी थीं। वे कला प्रवीण तो थे ही, साथ ही उसी कला के पारखी बनकर उन्होंने उत्तम निर्देशन की मिसाल भी कायम की जो आज भी फिल्म उद्योग में जानी जाती है। वे सिने जगत में लंबे समय तक छाए रहे। उनकी कुंडली में तुला राशि में, चतुर्थ भाव में स्थित होकर मालव्य योग की रचना कर रहे हैं साथ ही शनि से युत भी हैं जो मालव्य योग की महानता के कारण कला के साथ न्याय करने में भी पूर्णतया सफल रहे। शुक्रदेव के मालव्य योग की प्रशंसा और गुणानुवाद जितने किए जाएं कम होगें यदि मैं यूं कहूँ कि बाढ़हिं कथा, पार नहीं पावहिं, तो उचित ही होगा।
Thursday, 9 November 2017
বৃহস্পতি ও জ্যোতিষ
| रु | शुक्र | शुक्र | 26.08.2017 |
| गुरु | शुक्र | सूर्य | 04.02.2018 |
| गुरु | शुक्र | चंद् | 25.03.2018 |
| गुरु | शुक्र | मंगल | 14.06.2018 |
| गुरु | शुक्र | राहु | 10.08.2018 |
| गुरु | शुक्र | गुरु | 03.01.2019 |
| गुरु | शुक्र | शनि | 13.05.2019 |
| गुरु | शुक्र | बुध | 14.10.2019 |
| गुरु | शुक्र | केतु | 29.02.2020 |
| गुरु | सूर्य | सूर्य | 26.04.2020 |
| गुरु | सूर्य | चंद् | 11.05.2020 |
| गुरु | सूर्य | मंगल | 04.06.2020 |
| गुरु | सूर्य | राहु | 21.06.2020 |
| गुरु | सूर्य | गुरु | 04.08.2020 |
| गुरु | सूर्य | शनि | 12.09.2020 |
| गुरु | सूर्य | बुध | 28.10.2020 |
| गुरु | सूर्य | केतु | 08.12.2020 |
| गुरु | सूर्य | शुक्र | 25.12.2020 |
| गुरु | चंद् | चंद् | 12.02.2021 |
| गुरु | चंद् | मंगल | 25.03.2021 |
| गुरु | चंद् | राहु | 22.04.2021 |
| गुरु | चंद् | गुरु | 04.07.2021 |
| गुरु | चंद् | शनि | 07.09.2021 |
जानिये कुंडली में गुरु की 12 भाव मे प्रभाव
जिस जातक के लग्न में बृहस्पति स्थित होता है, वह जातक दिव्य देह से युक्त, आभूषणधारी, बुद्धिमान, लंबे शरीर वाला होता है।. ऐसा व्यक्ति धनवान, प्रतिष्ठावान तथा राजदरबार में मान-सम्मान पाने वाला होता है।. शरीर कांति के समान, गुणवान, गौर वर्ण, सुंदर वाणी से युक्त,सतोगुणी एवं कफ प्रकृति वाला होता है।दीर्घायु, सत्कर्मी, पुत्रवान एवं सुखी बनाता है लग्न का बृहस्पति।.
जिस जातक के लग्न में बृहस्पति स्थित होता है, वह जातक दिव्य देह से युक्त, आभूषणधारी, बुद्धिमान, लंबे शरीर वाला होता है।. ऐसा व्यक्ति धनवान, प्रतिष्ठावान तथा राजदरबार में मान-सम्मान पाने वाला होता है।. शरीर कांति के समान, गुणवान, गौर वर्ण, सुंदर वाणी से युक्त,सतोगुणी एवं कफ प्रकृति वाला होता है।दीर्घायु, सत्कर्मी, पुत्रवान एवं सुखी बनाता है लग्न का बृहस्पति।.
जिस जातक के द्वितीय भाव में बृहस्पति होता है, उसकी बुद्धि, उसकी स्वाभाविक रुचि काव्य-शास्त्र की ओर होती है।. द्वितीय भाव वाणी का भी होता इस कारण जातक वाचाल होता है।. उसमें अहम की मात्रा बढ़ जाती है।. क्योंकि द्वितीय भाव कुटुंब, वाणी एवं धन का होता है और बृहस्पति इस भाव का कारक भी है, इस कारण द्वितीय भाव स्थित बृहस्पति, कारक भावों नाश्यति के सूत्र के अनुसार, इस भाव के शुभ फलों में कमी ही करता देखा गया है।. धनार्जन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना,वाणी की प्रगल्भता, अथवा बहुत कम बोलना और परिवार में संतुलन बनाये रखने हेतु उसे प्रयास करने पड़ते हैं।. राजदरबार में उसे दंड देने का अधिकारी होता है। अन्य लोग इसका मान-सम्मान करते हैं।. ऐसा जातक शत्रुरहित होता है।. आयुर्भाव पर पूर्ण दृष्टि होने के कारण वह दीर्घायु और विध्वान होता है।. पाप ग्रह से युक्त होने पर शिक्षा में रुकावटें आती हैं तथा वहमिथ्याभाषी हो जाता है।. दूषित गुरु से शुभ फलों मेंकमी आती है और घर के बड़ों से विरोध कराता है।.
जिस जातक के तृतीय भाव में बृहस्पति होता है, वह मित्रों के प्रति कृतघ्न और सहोदरों का कल्याण करने वाला होता है।. वराहमिहिर के अनुसार वह कृपण होता है।. इसी कारण धनवान हो कर भी वह निर्धन के समान परिलक्षित होता है।. परंतु शुभ ग्रहों से युक्त होने पर उसे शुभ फल प्राप्त होते हैं।. पुरुष राशि में होने पर शिक्षा अपूर्ण रहती है, परंतु विधवान प्रतीत होता है।. इस स्थान में स्थित गुरु के जातक के लिए सर्वोत्तम व्यवसाय अध्यापक का होता है।. शिक्षक प्रत्येक स्थिति में गंभीर एवं शांत बने रहते हैं तथा परिस्थितियों का कुशलतापूर्वक सामना करते हैं।.
जिस जातक के चतुर्थ स्थान में बलवान बृहस्पति होता है, वह देवताओं और ब्राह्मणों से प्रीति रखता है, राजा से सुख प्राप्त करता है, सुखी, यशस्वी, बली, धन-वाहनादि से युक्त होता है और पिता को सुखी बनाता है।. वह सुहृदय एवं मेधावी होता है। इस भाव में अकेला गुरू पूर्वजों से संपत्ति प्राप्त करता है।.
जिस जातक के पंचम स्थान में बृहस्पति होता है, वह बुद्धिमान, गुणवान, तर्कशील, श्रेष्ठ एवं विद्वानों द्वारा पूजित होता है।. धनु एवं मीन राशि में होने से उसकी कम संतति होती है।. कर्क में वह संतति रहित भी देखा गया है।. सभा में तर्कानुकूल उचित बोलने वाला, शुद्धचित तथा विनम्र होता है।.
जिस जातक के पंचम स्थान में बृहस्पति होता है, वह बुद्धिमान, गुणवान, तर्कशील, श्रेष्ठ एवं विद्वानों द्वारा पूजित होता है।. धनु एवं मीन राशि में होने से उसकी कम संतति होती है।. कर्क में वह संतति रहित भी देखा गया है।. सभा में तर्कानुकूल उचित बोलने वाला, शुद्धचित तथा विनम्र होता है।.
पंचमस्थ गुरु के कारण संतान सुख कम होता है।. संतान कम होती है और उससे सुख भी कम ही मिलता है।.
रिपु स्थान, अर्थात जन्म लग्न से छठे स्थान में बृहस्पति होने पर जातक शत्रुनाशक, युद्धजया होता है एवं मामा से विरोध करता है।. स्वयं, माता एवं मामा के स्वास्थ्य में कमी रहती है।. संगीत विधा में अभिरुचि होती है।. पाप ग्रहों की राशि में होने से शत्रुओं से पीड़ित भी रहता है।. गुरु – चंद्र का योग इस स्थान पर दोष उत्पन्न करता है।. यदि गुरु शनि के घर राहु के साथ स्थित हो, तो रोगों का प्रकोप बना रहता है।. इस भाव का गुरु वैध, डाक्टर और अधिवक्ताओं हेतु अशुभ है।. इस भाव के गुरु के जातक के बारे में लोग संदिग्ध और संशयात्मा रहते हैं।. पुरुष राशि में गुरु होने पर जुआ, शराब और वेश्या से प्रेम होता है।. इन्हें मधुमेह, बहुमूत्रता, हर्निया आदि रोग हो सकते हैं।. धनेश होने पर पैतृक संपत्ति से वंचित रहना पड़ सकता है।.
जिस जातक के जन्म लग्न से सप्तम भाव में बृहस्पति हो, तो ऐसा जातक, बुद्धिमान, सर्वगुणसंपन्न, अधिक स्त्रियों में आसक्त रहने वाला, धनी, सभा में भाषण देने में कुशल, संतोषी, धैर्यवान, विनम्र और अपने पिता से अधिक और उच्च पद को प्राप्त करने वाला होता है।. इसकी पत्नी पतिव्रता होती है।. मेष, सिंह, मिथुन एवं धनु में गुरु हो, तो शिक्षा के लिए श्रेष्ठ है, जिस कारण ऐसा व्यक्ति विधवान, बुद्धिमान, शिक्षक, प्राध्यापक और न्यायाधीश हो सकता है।.
जिस व्यक्ति के अष्टम भाव में बृहस्पति होता है, वह पिता के घर में अधिक समय तक नहीं रहता।. वह कृशकाय और दीर्घायु होता है।. द्वितीय भाव पर पूर्ण दृष्टि होने के कारण धनी होता है।. वह कुटुंब से स्नेह रखता है।. उसकी वाणी संयमित होती है।. यदि शत्रु राशि में गुरु हो, तो जातक शत्रुओं से घिरा हुआ, विवेकहीन, सेवक, निम्न कार्यों में लिप्त रहने वाला और आलसी होता है।. स्वग्रही एवं शुभ राशि में होने पर जातक ज्ञानपूर्वक किसी उत्तम स्थान पर मृत्यु को प्राप्त करता है।. वह सुखी होता है।. बाह्य संबंधों से लाभान्वित होता है। स्त्री राशि में होने के कारण अशुभ फल और पुरुष राशि में होने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।.
जिस जातक के नवम स्थान में बृहस्पति हो, उसका घर चार मंजिल का होता है।. धर्म में उसकी आस्था सदैव बनी रहती है।. उसपर राजकृपा बनी रहती है, अर्थात जहां भी नौकरी करेगा, स्वामी की कृपा दृष्टि उसपर बनी रहेगी।. वह उसका स्नेह पात्र होगा।. बृहस्पति उसका धर्म पिता होगा।. सहोदरों के प्रति वह समर्पित रहेगा और ऐश्वर्यशाली होगा।. उसका भाग्यवान होना अवश्यंभावी है और वह विद्वान, पुत्रवान,सर्वशास्त्रज्ञ, राजमंत्री एवं विद्वानों का आदर करने वाला होगा।.
जिस जातक के दसवें भाव में बृहस्पति हो, उसके घर पर देव ध्वजा फहराती रहती है।. उसका प्रताप अपने पिता-दादा से कहीं अधिक होता है।. उसको संतान सुख अल्प होता है।. वह धनी और यशस्वी, उत्तम आचरण वाला और राजा का प्रिय होता है।. इसे मित्रों का, स्त्री का, कुटुंब का धन और वाहन का पूर्ण सुख प्राप्त होता है।. दशम में रवि हो, तो पिता से, चंद्र हो, तो माता से, बुध हो, तो मित्र से, मंगल हो, तो शत्रु से, गुरु हो, तो भाई से, शुक्र हो, तो स्त्री से एवं शनि हो, तो सेवकों से उसे धन प्राप्त होता है।.
जिस जातक के एकादश भाव में बृहस्पति हो, उसकी धनवान एवं विधवान भी सभा में स्तृति करते हैं।. वह सोना-चांदी आदि अमूल्य पदार्थों का स्वामी होता है।. वह विधवान, निरोगी, चंचल, सुंदर एवं निज स्त्री प्रेमी होता है।. परंतु कारक भावों नाश्यति, के कारण इस भाव के गुरु के फल सामान्य ही दृष्टिगोचर होते हैं, अर्थात इनके शुभत्व में कमी आती है।.
जिस जातक के द्वादश भाव में बृहस्पति हो, तो उसका द्रव्य अच्छे कार्यों में व्यय होने के पश्चात् भी, अभिमानी होने के कारण, उसे यश प्राप्त नहीं होता है।. निर्धन ,भाग्यहीन, अल्प संतति वाला और दूसरों को किस प्रकार से ठगा जाए, सदैव ऐसी चिंताओं में वह लिप्त रहता है।. वह रोगी होता है और अपने कर्मों के द्वारा शत्रु अधिक पैदा कर लेता है।. उसके अनुसार यज्ञ आदि कर्म व्यर्थ और निरर्थक हैं।. आयु का मध्य तथा उत्तरार्द्ध अच्छे होते है।. इस प्रकार यह अनुभव में आता है कि गुरु कितना ही शुभ ग्रह हो, लेकिन यदि अशुभ स्थिति में है, तो उसके फलों में शुभत्व की कमी हो जाती है और अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं और शुभ स्थिति में होने पर गुरु कल्याणकारी होता है।.
बृहस्पति का राशि फल
(गुरु कुंडली में किस राशि में क्या फल देता है)
मेष में – गुरु हो तो जातक तर्क वितर्क करने वाला ,किसी से न दबने वाला ,सात्विक,धनी,कार्य
क्षेत्र में विख्यात,क्षमाशील ,पुत्रवान,बलवान
,प्तिभाशाली,तेजस्वी, शत्रु वाला,बहु
व्ययी ,दंडनायक व तीक्ष्ण स्वभाव का
होता है |
क्षेत्र में विख्यात,क्षमाशील ,पुत्रवान,बलवान
,प्तिभाशाली,तेजस्वी, शत्रु वाला,बहु
व्ययी ,दंडनायक व तीक्ष्ण स्वभाव का
होता है |
वृष में गुरु हो तो जातक वस्त्र अलंकार प्रेमी ,विशाल
देह वाला ,देव –ब्राह्मण –गौ भक्त, प्रचारक
,सौभाग्यशाली,अपनी स्त्री में
ही आसक्त ,सुन्दर कृषि व गौ धन युक्त, वैद्यक
क्रिया में कुशल ,मनोहर वाणी-बुद्धि व गुणों से युक्त,विनम्र तथा नीतिकुशल होता है
देह वाला ,देव –ब्राह्मण –गौ भक्त, प्रचारक
,सौभाग्यशाली,अपनी स्त्री में
ही आसक्त ,सुन्दर कृषि व गौ धन युक्त, वैद्यक
क्रिया में कुशल ,मनोहर वाणी-बुद्धि व गुणों से युक्त,विनम्र तथा नीतिकुशल होता है
मिथुन में गुरु हो तो जातक ,विज्ञान विशारद ,बुद्धिमान,सुनय
नी,सरल,निपुण, ,मान्य ,गुरुजनों व बंधुओं से सत्कृत होता है |
कर्क में गुरु हो तो जातक विद्वान,सुरूप देह युक्त ,ज्ञानवान धार्मिक, सत्य स्वभाव वाला,यशस्वी ,अन्न संग्रही ,कोषाध्यक्ष,स्थिर पुत्र वाला,संसार में पूज्य विशिष्ट कर्मा तथा मित्रों में आसक्त होता है |
नी,सरल,निपुण, ,मान्य ,गुरुजनों व बंधुओं से सत्कृत होता है |
कर्क में गुरु हो तो जातक विद्वान,सुरूप देह युक्त ,ज्ञानवान धार्मिक, सत्य स्वभाव वाला,यशस्वी ,अन्न संग्रही ,कोषाध्यक्ष,स्थिर पुत्र वाला,संसार में पूज्य विशिष्ट कर्मा तथा मित्रों में आसक्त होता है |
सिंह में गुरु हो तो जातक स्थिर शत्रुता वाला ,धीर विद्वान,शिष्ट परिजनों से युक्त,राजा या उसके तुल्य,पुरुषार्थी स्वभाव में लक्ष्य ,क्रोध से समस्त शत्रुओं को
जीतने वाला ,सुदृढ़ शरीर का ,वन-पर्वत
आदि के भ्रमण में रूचि रखने वाला होता है |
जीतने वाला ,सुदृढ़ शरीर का ,वन-पर्वत
आदि के भ्रमण में रूचि रखने वाला होता है |
कन्या में गुरु हो तो जातक मेधावी, धार्मिक ,कार्यकुशल गंध –पुष्प-वस्त्र प्रेमी ,कार्यों में स्थिर, शास्त्रज्ञान व शिल्प कार्य से धनी दानी सुशील चतुर ,अनेक भाषाओं का ज्ञाता तथा धनी होता है |
तुला मे गुरु हो तो जातक मेधावी ,पुत्रवान,विदेश भ्रमण
से धनी विनीत ,आभूषण प्रिय ,नृत्य व
नाटक से धन संग्रह करने वाला ,सुन्दर ,अपने सह व्यापारियों में
बड़ा,पंडित,देव अतिथि का पूजन करने वाला होता है |
से धनी विनीत ,आभूषण प्रिय ,नृत्य व
नाटक से धन संग्रह करने वाला ,सुन्दर ,अपने सह व्यापारियों में
बड़ा,पंडित,देव अतिथि का पूजन करने वाला होता है |
वृश्चिक में गुरु हो तो जातक अधिक शास्त्रों में चतुर ,क्षमाशील, नृपति, ग्रंथों का भाष्य करने वाला ,निपुण,देव मंदिर व नगर में कार्य करने वाला , सद्स्त्रीवान,अल्प पुत्र वाला ,रोग से पीड़ित अधिक श्रम करने वाला ,क्रोधी, धर्म में पाखण्ड करने वाला व निंद्य आचरण वाला होता है |
धनु में गुरु हो तो जातक आचार्य ,स्थिर धनी ,दाता ,
मित्रों का शुभ करने वाला ,परोपकारी ,शास्त्र में तत्पर
,मंत्री या सचिव ,अनेक देशों का भ्रमण करने वाला तथा
तीर्थ सेवन में रूचि रखने वाला होता है |
मित्रों का शुभ करने वाला ,परोपकारी ,शास्त्र में तत्पर
,मंत्री या सचिव ,अनेक देशों का भ्रमण करने वाला तथा
तीर्थ सेवन में रूचि रखने वाला होता है |
मकर में गुरु हो तो जातक अल्प बलि ,अधिक मेहनत करने वाला
,क्लेश धारक,नीच आचरण करने वाला ,मूर्ख ,निर्धन ,
दूसरों की नौकरी करने वाला , दया –धर्म –
प्रेम –पवित्रता –स्व बन्धु व मंगल से रहित ,दुर्बल देह वाला
,डरपोक,प्रवासी,व विषाद युक्त होता है |
,क्लेश धारक,नीच आचरण करने वाला ,मूर्ख ,निर्धन ,
दूसरों की नौकरी करने वाला , दया –धर्म –
प्रेम –पवित्रता –स्व बन्धु व मंगल से रहित ,दुर्बल देह वाला
,डरपोक,प्रवासी,व विषाद युक्त होता है |
कुम्भ में गुरु हो तो जातक चुगलखोर ,असाधु ,निंद्य कार्यों में तत्पर
,नीच जन सेवी
,पापी,लोभी ,रोगी ,अपने वचनों
के दोष से अपने धन का नाशक ,बुद्धिहीन व गुरु
की स्त्री में आसक्त होता है |
,नीच जन सेवी
,पापी,लोभी ,रोगी ,अपने वचनों
के दोष से अपने धन का नाशक ,बुद्धिहीन व गुरु
की स्त्री में आसक्त होता है |
मीन में गुरु हो तो जातक वेदार्थ शास्त्र वेत्ता ,मित्र व
सज्जनों द्वारा पूजनीय ,राज मंत्री ,प्रशंसा
प्राप्त करने वाला ,धनी ,निडर ,गर्वीला,
स्थिर कार्यारम्भ करने वाला ,शांतिप्रिय ,विख्यात ,नीति व
व्यवहार को जानने वाला होता है |
(गुरु पर किसी अन्य ग्रह कि युति या दृष्टि के प्रभाव
से उपरोक्त राशि फल में परिवर्तन भी संभव है|कुंडली में है गुरुचाण्डाल योग तो उत्पन्न होती हैं ये समस्याएं- बचने के लिए करें ये उपाय -
।।श्री हनुमते नमः।।
सज्जनों द्वारा पूजनीय ,राज मंत्री ,प्रशंसा
प्राप्त करने वाला ,धनी ,निडर ,गर्वीला,
स्थिर कार्यारम्भ करने वाला ,शांतिप्रिय ,विख्यात ,नीति व
व्यवहार को जानने वाला होता है |
(गुरु पर किसी अन्य ग्रह कि युति या दृष्टि के प्रभाव
से उपरोक्त राशि फल में परिवर्तन भी संभव है|कुंडली में है गुरुचाण्डाल योग तो उत्पन्न होती हैं ये समस्याएं- बचने के लिए करें ये उपाय -
ज्योतिष में ग्रहों की भिन्न भिन्न युतियों से बनने वाले अनेकों योगो का वर्णन किया गया है जिनमे से कुछ योग बहुत सकारात्मक परिणाम देने वाले होते हैं तो कुछ ग्रहयोग विपरीत और नकारात्मक परिणाम देने वाले होते हैं, गुरु-चाण्डाल योग फलित ज्योतिष में एक बहुत ही प्रसिद्ध योग है जिसका जिक्र अधिकांशतः कुंडली विश्लेषण के अन्तर्गत मिलता ही रहता है गुरु चाण्डाल योग को एक नकारात्मक और विपरीत परिणाम देने वाला योग माना गया है जिसके जन्मकुंडली में होने से बहुत सी समस्याएं और संघर्ष उत्पन्न होते हैं। ...................
वास्तव में गुरु चाण्डाल योग बृहस्पति और राहु की युति से बनने वाला योग है जब कुंडली में "बृहस्पति" और "राहु" एक साथ स्थित हों तो इसे ही गुरु चाण्डाल योग कहते हैं इस योग में सत्व का कारक बृहस्पति तामसिक ग्रह राहु से पीड़ित हो जाता है और बृहस्पति हमारे जीवन चक्र के बहुत महत्वपूर्ण घटकों का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए इस योग के बनने पर व्यक्ति को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, यदि कुंडली में गुरु-चाण्डाल योग बन रहा हो तो सबसे पहले तो कुंडली के जिस भाव में यह योग बन रहा हो उसे हानि पहुंचता है अर्थात कुंडली के जिस भाव में गुरु चाण्डाल योग बन रहा हो उस भाव से सम्बंधित वस्तुओं या घटकों को लेकर जीवन में संघर्ष उत्पन्न होता है इसके अलावा गुरु चाण्डाल योग बनने पर व्यक्ति की विवेक क्षमता क्षीण हो जाती है व्यक्ति बुद्धिमान होने पर भी अधिक विवेकशील नहीं होता अर्थात अपनी बुद्धि का सही प्रयोग नहीं कर पाता और अच्छे निर्णय नहीं ले पाता ऐसे व्यक्ति को हमेशा एक अच्छे सलाहकार की आवश्यकता होती है,
कुंडली में गुरु चाण्डाल योग बनने पर व्यक्ति क्रोधित व इरिटेटिड स्वभाव का होता है इस योग में व्यक्ति के विवेक अर्थात बृहस्पति को राहु ग्रस लेता है इसलिए ऐसा व्यक्ति अधिकतर क्रोध में अपशब्दों का प्रयोग कर बैठता है, गुरु चाण्डाल योग बनने पर व्यक्ति की शिक्षा में भी बहुत बाधाएं आती हैं तथा इस योग के नकारात्मक प्रभाव के कारण व्यक्ति को धर्म कार्य करने में और अपने अच्छे कार्यों को पूरा करने में बहुत बाधाएं आती है तथा व्यक्ति को अच्छे लोगों व अच्छे गुरु की संगती नहीं मिल पाती। स्वास्थ पर भी यह योग नकारात्मक प्रभाव डालता है गुरु चाण्डाल बनने पर व्यक्ति को लीवर से सम्बंधित समस्याएं, पीलिया, स्वर्ण क्षमता अर्थात कम सुनाई देने की समस्या और फेट से जुडी समस्याएं भी होती हैं। गुरु चाण्डाल योग होने पर व्यक्ति प्रबंध शक्ति कमजोर होती है अर्थात परिस्थितियों को मैनेज करने में समस्या आती है बृहस्पति को संतान का नैसर्गिक कारक माना गया है इसलिए गुरु-चाण्डाल योग बनने पर संतान सुख में भी बाधा की सम्भावना होती है या संतान के साथ वैचारिक ताल मेल नहीं बैठ पाता।
कुंडली में गुरु चाण्डाल योग बनने पर व्यक्ति क्रोधित व इरिटेटिड स्वभाव का होता है इस योग में व्यक्ति के विवेक अर्थात बृहस्पति को राहु ग्रस लेता है इसलिए ऐसा व्यक्ति अधिकतर क्रोध में अपशब्दों का प्रयोग कर बैठता है, गुरु चाण्डाल योग बनने पर व्यक्ति की शिक्षा में भी बहुत बाधाएं आती हैं तथा इस योग के नकारात्मक प्रभाव के कारण व्यक्ति को धर्म कार्य करने में और अपने अच्छे कार्यों को पूरा करने में बहुत बाधाएं आती है तथा व्यक्ति को अच्छे लोगों व अच्छे गुरु की संगती नहीं मिल पाती। स्वास्थ पर भी यह योग नकारात्मक प्रभाव डालता है गुरु चाण्डाल बनने पर व्यक्ति को लीवर से सम्बंधित समस्याएं, पीलिया, स्वर्ण क्षमता अर्थात कम सुनाई देने की समस्या और फेट से जुडी समस्याएं भी होती हैं। गुरु चाण्डाल योग होने पर व्यक्ति प्रबंध शक्ति कमजोर होती है अर्थात परिस्थितियों को मैनेज करने में समस्या आती है बृहस्पति को संतान का नैसर्गिक कारक माना गया है इसलिए गुरु-चाण्डाल योग बनने पर संतान सुख में भी बाधा की सम्भावना होती है या संतान के साथ वैचारिक ताल मेल नहीं बैठ पाता।
उपाय -
यदि कुंडली में गुरु चाण्डाल योग होने पर बाधाओं का सामना हो रहा हो तो निम्लिखित उपाय इस योग के नकारात्मक परिणाम को कम करने में अवश्य सहायक होंगे -
1. ॐ ग्राम ग्रीम ग्रौम सः गुरवे नमः का नियमित जाप करें (एक माला रोज)
2. प्रत्येक बृहस्पतिवार को भीगी हुई चने की दाल और गुड़ गाय को खिलाएं।
3. मस्तक पर हल्दी का तिलक लगाएं।
4. प्रत्येक शनिवार को साबुत उडद गरीब व्यक्ति को दान करें।
5. प्रतिदिन पक्षियों को भोजन दें।
6. विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।
7. ज्योतिषीय सलाह के बाद बृहस्पति का रत्न सुनैहला भी पहन सकते हैं .
।।श्री हनुमते नमः।।
Wednesday, 4 January 2017
শনি বন্দনা
নবগ্রহের নিয়ে আলোচনা সময় শনি গ্রহ ছাড়া অন্য গ্রহের থেকে ভয় ভীত হয়না । সাধারন মানুষের শনিকে কষ্টদায়ক গ্রহ মনে করে । শনির প্রভাব প্রত্যেক রাশিতে সময় মত সময়ে পড়ে । শনি তার সাড়ে সাতি বা ঢৈইয়া তে শনি জাতকের জীবন প্রভাবিত করে । শনিদেব ব্যক্তির জীবনে তার কর্ম অনুসারে ফল প্রদান করে । কারন তিনি হলেন ন্যায়াধীশ । শনি দেব তার ন্যায় বিচার থেকে কেউ বঞ্ছিত করেন না । যাকে শুভ ফল দেন তাকে ভিখারি থেকে রাজা বানিয়ে দেন ।আর যাকে দণ্ড দেন তা নির্মম ভাবে দেন , আর যাকে শুভ ফল দেন তাকে আশাতীত ফল দেন । এই জন্য মানুষ শনির সাড়ে সাতিতে আশ্চর্যজনক ভাবে লক্ষ্যের আকাশে পৌঁছে যান । শনি দেব প্রত্যেক ব্যক্তির তার দ্বারা করা কাজের ফল প্রদান করেন । শনি মহারাজ কে ভয় পাবার কিছু নেই । শুধু নিজের কর্মে বিশ্বাস রাখুন । আপনার এই জন্মে বা আগের জন্মের কাজ কর্ম যদি ভাল থাকে তাহলে আপনি আপনার শুভ কর্মের জন্য শনি দেবের আশীর্বাদ পাবেন । আর একটি পথ আছে আপীল করার তার আদলতে আপনার অপরাধ স্বীকার করে তার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা । শনি দেব শুধু চান জাতক তাকে স্মরণ করুক , তার পুজা পাঠ করুক । শনিদেবের জন্ম সূর্য ছায়ার গর্ভে , শনির ভায়ের নাম যম আর বোন যমুনা ।
শনি দেব হনুমান জী কে কথা দেন যে কলি যুগে হনুমান যে সেবা করবে তাকে শনি কাউকে কষ্ট দেবেন না । অর্থাৎ হনুমান জী সেবা আর পুজা পাঠ শনির দেওয়া কষ্ট থেকে মুক্তি পাবেন ।
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